सकट चौथ व्रत कथा (Sakat Chauth Vrat Katha)
सकट चौथ को तिल चौथ, संकष्टी चतुर्थी और माघी चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को माताएँ संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सभी संकटों से रक्षा के लिए रखती हैं। इस दिन भगवान गणेश की विशेष पूजा होती है।
कथा के अनुसार, एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी अत्यंत श्रद्धालु थी और संतान सुख की कामना से सकट चौथ का व्रत करती थी। व्रत के दिन वह दिनभर उपवास रखती, तिल-गुड़ से बने प्रसाद का भोग लगाती और चंद्रमा के दर्शन के बाद ही भोजन करती।
एक वर्ष अत्यधिक गरीबी के कारण उसके पास पूजा सामग्री भी नहीं थी, फिर भी उसने पूर्ण श्रद्धा से भगवान गणेश का स्मरण कर व्रत किया। रात को चंद्रमा के उदय के बाद उसने केवल जल ग्रहण किया। उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश प्रकट हुए और वरदान दिया कि उसके घर से सभी संकट दूर होंगे और संतान सुख प्राप्त होगा।

कुछ समय बाद ब्राह्मणी के घर पुत्र का जन्म हुआ और परिवार में सुख-समृद्धि आ गई। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि सकट चौथ का व्रत विधि-विधान से करने पर संतान की रक्षा होती है और जीवन के विघ्न दूर होते हैं।
व्रत का महत्व
- संतान की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना
- परिवार में सुख-शांति और समृद्धि
- जीवन के संकटों से मुक्ति
पूजा संक्षेप विधि
- प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें
- दिन में उपवास रखें (फलाहार/निर्जल अपनी क्षमता अनुसार)
- शाम को तिल, गुड़, लड्डू अर्पित कर गणेश पूजा करें
- चंद्रमा दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोलें